मंटो तो आज भी है

विशाल स्वरूप ठाकुर

Manto

आदमी कितना बुरा हो सकता है, कितना बुरा सोच सकता है, कितना बुरा कर सकता है! ये जानना तब बड़ा आसान हो जाता है जब हम लाइसेंस, जैसी कहानी पढ़ लेते हैं, ठंडा गोश्त पढ़ लेते हैं, वो सारे अफ़साने पढ़ लेते हैं जिन्हें एक समय में लोगों ने समझना तो दूर, पढ़ना भी जरूरी नहीं समझा। जिसे पढ़ने से ये मालूम हो जाता है कि हम दुनिया की नज़र में कितने ही भले मानस क्यों न हों! पर अंदर ही अंदर अपनी सोच, अपनी दृष्टि से कहीं न कहीं हम उस कहानी के पात्र होते हैं जिन्हें सादत हसन मंटो लिख चले गए! और चले गए।

जिस दिन सादात हसन ने दुनिया को अलविदा कहा! उस दिन एक  अदद आदमी धरती पर रह गया जो आज तक यहीं है! वह है मंटो! उस दिन से हर सिक्के के दूसरे पहलू को जानने वाले, और हर अच्छाई के लिहाफ़ में  छिपी बुराई को देखने वाले आदमी में मंटो ने अपनी जगह बना ली और तब से आज तक वो उन आदमियों के ज़रिए दुनिया को उनकी हकीकत, जो सरासर नीचता है, उसको दिखाता आ रहा है।

हवा के गुब्बारे को पानी मे जितना भीतर ले जाया जाए! वो ऊपर उठता ही है और एक उछाल के साथ सबको दीखने लगता है। मंटो हवा का वही गुब्बारा है जिसे हमारा समाज हर दिन पानी मे नीचे दबाने में लगा है, उसके अफसानों को भुलाने में लगा है, लेकिन वो गुब्बारा दिन के सातवें पहर में एक बार उछाल मरता है और पानी को छितराते हुए समाज को उसकी कमजोरी और कायरता दिखा जाता है।

जिन पाखंडों का विरोध मंटो के शब्दों ने चींख चींख कर किया है, वो पाखंड आज भी हैं। व्यक्ति व्यक्ति में हैं, बस जरूरत है अपने अंदर उस मंटो को लाने की, जो खुद की आत्मा को गाली दे सके, खुद की हक़ीक़त को आपको बता सके! मैं आप, हम सब में एक समाज है, तो एक मंटो भी है।
जब जब हमें अपनी सोच पर लानत आने लगती है, अपनी आदतों पर खिन्न होने लगते हैं, खुद की नज़रों में गिरा हुआ महसूस करते हैं, तब तब हमारे भीतर मंटो जीवित होता है।

मंटो तो हमारे अंदर हमेशा है, पर हमेशा हम उसे पहचान नहीं पाते।